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सोनिया मिश्रा/ चमोली. जहां समय के साथ रीति रिवाज, संस्कृति, भाषा बोली, खान पान बदल चुका है, वहीं उत्तराखंड के ग्रामीण अंचलों में बसे ग्रामीण आज भी अपनी वर्षों पुरानी रीति को निभा रहे हैं और आज भी जब गांवों में कोई भी शुभ काम होता है या जब चैत्र माह में बेटियां अपने ससुराल लौटती हैं, तो बेटियों को मायके पक्ष के लोगों द्वारा अरसे (पहाड़ी मिठाई) बनाकर दिए जाते हैं, जिसे कलेऊ भी कहते हैं. पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी महिला को अरसे चैत के महीने में दिए जाते हैं, जिसे बनाने का तरीका भी खास है.

चमोली जिले के गौचर की रहने वालीं उर्मिला देवी लोकल 18 को बताती हैं कि अरसे बनाने के लिए घर पर आसानी से मिलने वाले सामान को प्रयोग में लाया जाता है, जिसमें चावल, चीनी, पानी, तेल और गुड़ शामिल है. अरसा बनाने के लिए सबसे पहले चावल को करीब 4 से 5 घंटे तक भिगोया जाता है. जब चावल भीग जाते हैं, तो चावल से पानी अलग निकालकर मुलायम कपड़े में इसे रखा जाता है, ताकि यह अच्छी तरह से सूख जाए. इसके बाद इन सूखे चावल को गांव की महिलाएं ‘ओखली’ (उर्खयाल और गंज्याऊ) मेंबारीक कूट लेती हैं. वर्तमान समय में महिलाएं इसे मिक्सी में भी पीस रही हैं. फिर चावल के तैयार आटे को गूंथ लेती हैं. वहीं दूसरी तरफ गर्म आंच पर गुड़ को अच्छे से पिघलाया जाता है और अब इस आटे की छोटी-छोटी लोई को गर्म तेल में डालते हैं और इसे गोल्डन कलर का होने तक फ्राई करते हैं. जब अरसे पक जाते हैं, तो उसे कंडी (रिंगाल से बने बर्तन) में डालते हैं. जिसके बाद अपनी ध्याणियों (विवाहिता बेटियों) को मालू के पत्तों में या डिब्बों में भेंट स्वरूप देते हैं.

महिलाओं को बेसब्री से रहता है कलेऊ का इंतजार
स्थानीय रीति-रिवाजों के जानकार गौचर निवासी प्रमोद सेमवाल लोकल 18 को बताते हैं कि चैत्र के महीने का पहाड़ों में बहुत महत्व है. इस महीने सभी अपनी विवाहिता बेटियों को कलेऊ (मिठाई) देने जाते हैं, जिसका महिलाओं को बेसब्री से इंतजार रहता है. वह बताते हैं कि पहाड़ की महिलाओं को समर्पित यह परंपरा महिला के मायके से जुड़ी भावनाओं और संवेदनाओं को बयां करती है, जिसमें यह पहाड़ी मिठाई कलेऊ यानी अरसा बेहद खास भूमिका निभाता है.

Tags: Food 18, Local18

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