अगर आप हल्के-फुल्के अंदाज में लिखी, रोजमर्रा की जिंदगी की दास्तानें पढ़ने में रुचि रखते हैं तो लेखिका, कवयित्री और पत्रकार शिल्पा शर्मा की शिवना प्रकाशन से प्रकाशित कहानी संग्रह ‘फ्रेम दर फ्रेम ज़िंदगी’ आप जैसे पाठकों के लिए ही है. महानगरीय आपाधापी के विभिन्न मुद्दों पर बेहद सरलता और संवेदनशीलता से बात करती ये कहानियां, बेवजह की भूमिका नहीं बांधतीं. इन कहानियों के किरदार हमारे आपके आसपास ही हैं. ध्यान से देखेंगे तो किसी-किसी कहानी में आप खुद को भी किसी न किसी रूप में पाएंगे.

वैसे तो ‘फ्रेम दर फ्रेम ज़िंदगी’ संग्रह की सभी कहानियां अलग-अलग कलेवर की हैं, उनको पढ़ना अलग-अलग जिंदगियों को पढ़ने जैसा लगता है, पर जो कहानी मुझे ख़ासतौर पर पसंद आई वह है, ‘ये प्यार, वो प्यार और तन्हाइयां’. रिटायरमेंट के बाद के जीवन की सच्चाई बयां करती यह कहानी एक दफ़े तो दिल तोड़ती-सी लगती है, पर रिटायर्ड विधुर मिस्टर सुर्वे के बेटी, बेटी, मेड और जान-पहचान के लोग उन्हें और उनकी तन्हा जिंदगी को संभाल लेते हैं. मिस्टर सुर्वे की दिनचर्या के छोटे-छोटे हिस्सों को बारीकी से दिखाकर अकेलेपन से जूझ रहे व्यक्ति की मनोस्थिति को लेखिका ने निहायत संजीदगी से कागज पर उकेरने का काम किया है.

भारतीय परिवारों की बात चल निकलने पर हम अक्सर टीवी सीरियल्स में दिखाए जानेवाले टिपिकल रिश्तों के बारे में सोचने लगते हैं. पर असल जिंदगी में अब लोगों की सोच बदल रही है. रिश्ते बेहतर हो रहे हैं. इसकी बानगी मिलती है ‘बदलते रिश्ते’ और ‘बुढ़ा गया हूं’ कहानियों में. जीवन की सांझ साथ बिता रही दो महिलाओं की कहानी ‘सांझ सहचरी’ दिल छू जाती है.

Hindi Kahani: मुंबई लोकल में परवान चढ़ता ‘ये प्यार, वो प्यार और तन्हाइयां’

शीर्षक कहानी ‘फ्रेम दर फ्रेम जिंदगी’ एक सफल महिला की डायरी के पन्नों से ली गई है. एक महिला को उसके उम्र के और करियर के अलग-अलग पड़ावों पर अलग-अलग फ्रेम्स में कैद करनी की बेवजह कोशिश की जाती है. इन्हीं फ्रेम के घेरों को तोड़कर अपनी असली पहचान की तलाश करती महिला की कहानी है ‘फ्रेम द फ्रेम जिंदगी.’

इस संग्रह की हर कहानी अपने साथ हमें सकारात्मकता की ओर ले चलती है. मन की कई गिरहें खुलती हैं. निम्न मध्यवर्गीय परिवार की व्यथा-कथा कहती ‘मैं…? वाष्पशीला’ वैसे तो एक दुखद कहानी प्रतीत होती है, पर यह कहीं न कहीं हमारे समाज की कड़वी हकीकत का आईना है.

इस संग्रह की कई कहानियों में मुंबई की लोकल का जिक्र किया गया है. यदि आप मुंबई के नहीं हैं तो आपको मुंबई की बहुसंख्यक आबादी को समझने का मौका मिलेगा, आखिर लोकल ट्रेन हर मुंबईकर का प्रतिनिधित्व जो करती है. किताब खत्म होने के बाद कहानियों और किरदारों की छाप हमारे मस्तिष्क पर लंबे समय तक रहती है. इसे लेखनशैली की सफलता के तौर पर देखा जाना चाहिए. हिंदी में ऐसी कहानियां लगातार लिखी जानी चाहिए.

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2 thoughts on “पुस्तक समीक्षाः संजीदा कहानियों का गुलदस्ता है ‘फ्रेम दर फ्रेम जिंदगी’”

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